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  • भीलवाड़ा

    भीलवाड़ा

    वस्त्र नगरी

    बिजोलिया

भीलवाड़ा

वस्त्र नगरी

विश्व प्रसिद्ध रामद्वारा रामस्नेही संप्रदाय का मूल स्थान, भीलवाड़ा मूलतः वस्त्रों और करघे का शहर रूप में विख्यात है। राजस्थान का सातवां, सबसे बड़ा शहर भीलवाड़ा, नो सौ साल पुराना है। एक कथा के अनुसार, यहाँ पर ‘‘भिलाड़ी’’ नाम से सिक्के ढाले जाते थे, उसी के नाम पर इसका नाम भीलवाड़ा पड़ा। दूसरी कथा के अनुसार यहाँ की भील जाति ने, महाराणा प्रताप की मुगलों के विरूद्ध युद्ध में सहायता की थी, तो इसका नाम भील-बाड़ा, भीलों का क्षेत्र - भीलवाड़ा रखा गया।

भीलवाड़ा में आने और तलाशने के लिए आकर्षण और जगहें

आईये भीलवाड़ा के प्रमुख आकर्षण और दर्शनीय स्थलों को जाने। राजस्थान में सदैव कुछ नया-निराला देखने को मिलता है।

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  • बदनोर फोर्ट

    बदनोर फोर्ट

    भीलवाड़ा में मध्ययुगीन भारतीय वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण बदनोर क़िला स्थित है। सात मंजिला, चौड़ा यह किला एक छोटी सी पहाड़ी पर बना हुआ है। भीलवाड़ा से 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित भीलवाड़ा आसिंद रोड पर, यह विहंगम दृश्य प्रस्तुत करता है। बदनोर क़िले के परकोटे के भीतर कई छोटे स्मारकों और मंदिरों के भी दर्शन किये जा सकते हैं।

  • पुर उड़न छतरी

    पुर उड़न छतरी

    पुर उड़न छतरी भीलवाड़ा शहर से लगभग 10 किलोमीटर दूर है। यह उड़न छतरी और आधारशिला महादेव के लिए प्रसिद्ध हैं। जहाँ एक छोटी सी चट्टान के ऊपर एक विशाल चट्टान के विश्राम करने का भौगोलिक आश्चर्य पर्यटकों को आकर्षित करता है।

  • खेड़ा के बालाजी

    खेड़ा के बालाजी

    खेड़ा के बालाजी में भगवान हनुमान की अप्रतिम छवि है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि बालाजी चट्टान पर स्वाभाविक रूप से दिखाई दिए थे। खेड़ा के बालाजी पर जाकर आप अन्य स्थानों जैसे पटोला महादेव, घाटा रानी मंदिर, माताजी मंदिर और नीलकंठ महादेव मंदिर की भी यात्रा कर सकते हैं।

  • माधव गौ विज्ञान अनुसंधान केन्द्र

    माधव गौ विज्ञान अनुसंधान केन्द्र

    भीलवाड़ा में ज़्यादातर स्थानीय लोगों के लिए गाय आजीविका का साधन है, इसलिए गांव गादरमाला में ’माधव गाय विज्ञान अनुसंधान केन्द्र’ बेहद लोकप्रिय है क्योंकि इससे उन्हें गाय के बारे में ज्ञान और उनके जानवरों की बेहतर देखभाल के तरीके के बारे में पता चलता है।

  • मांडल

    मांडल

    भीलवाड़ा शहर से करीब 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है मांडल। जहां एक छतरी जगन्नाथ कच्छवाहा के स्मारक के रूप में है, जिसे बत्तीस खम्भों की छतरी के रूप में भी जाना जाता है। जैसा कि नाम से पता चलता है यहाँ एक सुंदर छतरी (स्मारक) है जिसमें बलुआ पत्थर से बने 32 स्तंभ हैं। उनमें निचले और ऊपरी भाग पर सुंदर नक्काशी की हुई है। छतरी में एक विशाल शिवलिंग हैं।

  • हरनी महादेव

    हरनी महादेव

    दराक परिवार के पूर्वजों द्वारा स्थापित और पास के गांव के नाम पर, हरनी महादेव एक शिव मंदिर है, जो शहर से लगभग 8 किलोमीटर दूर स्थित है। सुरम्य पहाड़ियों से घिरा यह मंदिर पर्यटकों के लिए एक रमणीय स्थल है।

  • गायत्री शक्ति पीठ

    गायत्री शक्ति पीठ

    गायत्री शक्ति पीठ, हिन्दू धर्म की प्रमुख देवी शक्ति या सती और भक्त सम्प्रदाय के मुख्य आराध्य का पवित्र पूजा स्थल है। भीलवाड़ा में, गायत्री शक्ति पीठ शहर में मुख्य बस स्टैण्ड के पास स्थित है।

  • धनोप माता जी

    धनोप माता जी

    संगरिया से 3 किलोमीटर दूर धनोप, एक छोटा गांव है जहां आप शीतला माता मंदिर के दर्शन कर सकते हैं ।यह मंदिर, चमकीली लाल दीवारों और स्तंभों, चौकोर खानों वाले संगमरमर के फर्श की रचना और देवी शीतला माता (देवी दुर्गा का अवतार) की काले पत्थर की प्रतिमा से सुसज्जित है।

  • श्री बीड़ के बालाजी

    श्री बीड़ के बालाजी

    सम्पूर्ण भारत में, बालाजी का नाम एक पंसदीदा नाम है जो वानर देवता श्री हनुमान के लिए प्रयुक्त किया जाता है। श्री बीड़ के बालाजी मंदिर शाहपुरा तहसील के कंचन गांव से 3 किलोमीटर दूर स्थित है और प्रकृति से घिरा हुआ है। अगर आप असीम शांति का अनुभव करना चाहते हैं तो यह एक सबसे पृथक शानदार स्थान है।

  • श्री चारभुजानाथ मंदिर

    श्री चारभुजानाथ मंदिर

    भीलवाड़ा आने वाले कई पर्यटक राजसमंद जाते हैं जहां श्री चारभुजानाथ मंदिर स्थित है। भीलवाड़ा से एक सुविधाजनक दूरी पर कोटड़ी तहसील में स्थित यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है।

  • बागोर साहिब

    बागोर साहिब

    बागोर साहिब एक ऐतिहासिक गुरूद्वारा है जहां श्री गुरू गोविन्द सिंह जी पंजाब की यात्रा पर जाते समय ठहरे। यह गुरूद्वारा तहसील मांडल के गांव बागोर में मांडल शहर से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित है। यहाँ की यात्रा से दसवें सिख गुरू, श्री गुरू गोविन्द सिंह जी की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है।

  • चामुण्डा माता मंदिर

    चामुण्डा माता मंदिर

    चामुंडा माता मंदिर हरनी महादेव की पहाड़ियों पर स्थित है। शिखर पर पहुँचने के बाद, पूरे शहर का विहंगम दृश्य देखने को मिलता है। यह स्थान, भीलवाड़ा से सिर्फ 5 किलोमीटर दूर है, यदि आप सुकून की तलाश में हैं तो यह स्थान सर्वथा उपयुक्त है।

  • मेनाल जल-प्रपात

    मेनाल जल-प्रपात

    भीलवाड़ा से 80 कि.मी. दूर, कोटा रोड पर नैशनल हाइवे 27 पर मेनाल अपने अलौकिक, नैसर्गिक वैभव के कारण, हजारों की संख्या में पर्यटकों को आकर्षित करता है। इस झरने के पास महानालेष्श्वर शिवालय है। चारों तरफ जंगलों से घिरा मेनाल का झरना, दूर दराज क्षेत्रों से आने वाले तथा विदेशी पर्यटकों को भी आकर्षित करता है। 150 फीट गहरी खाई में गिरने वाली इसकी जलधारा, बड़ी जोर की आवाज़ करती है और देखने वालों की नज़र वहाँ से नही हटती। मेनाल में शिव जी का अत्यन्त सुन्दर, वैभवशाली मंदिर है।

  • जटाऊँ का मंदिर

    जटाऊँ का मंदिर

    11वीं षताब्दी के मध्य में स्थापित जटाऊँ का मंदिर एक शिव मंदिर है, माना जाता है कि इसे एक भील आदिवासी ने बनाया था, जो यहाँ पहले - पहल बसने आया था।

  • गणेश मंदिर

    गणेश मंदिर

    गणेश मंदिर को समर्पित एक अत्यंत श्रद्धेय मंदिर है। विनायक चतुर्थी को यहाँ बड़ी धूमधाम रहती है जो पूरे राजस्थान के आकर्षण का केन्द्र बनता है। यहाँ गणेश मेला भी आयोजित किया जाता है।

  • मेजा बाँध

    मेजा बाँध

    भीलवाड़ा से 20 किलोमीटर दूर स्थित मेजा बाँध भीलवाड़ा में सबसे बड़ा बाँध है। यह अपने हरे भरे बाग के लिए विख्यात है। यह एक लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण और पिकनिक स्थान है।

  • बिजोलिया

    बिजोलिया

    भीलवाड़ा जिले का शहर बिजोलिया यहाँ के श्री दिगंबर जैन पार्श्वनाथ अतिषय तीर्थक्षेत्र, बिजोलिया किला और मंदाकिनी मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। बूंदी-चित्तौड़गढ़ रोड पर स्थित, किले में स्थित शिव मंदिर हजारेश्वर महादेव मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह अपनी आकर्षक कला और वास्तुकला के लिए पर्यटकों में लोकप्रिय है। तीर्थांकर पार्श्वनाथ को समर्पित, श्री दिगंबर जैन पार्श्वनाथ अतिशय तीर्थक्षेत्र 2700 वर्षों पहले का माना जाता है।

  • तिलस्वां महादेव

    तिलस्वां महादेव

    बिजोलिया से 15 कि.मी. दूर स्थित चार मंदिर हैं, जिनमें से प्रमुख सर्वेश्वर (शिव) को समर्पित है, जो कथित तौर पर 10वीं या 11वीं सदी से सम्बन्धित है। मंदिर परिसर में एक मठ, एक कुंड या जलाशय और एक तोरण अथवा विजय स्मारक भी है। यहाँ शिवरात्रि को विशाल मेला लगता है जिस में दूर दूर से हज़ारों श्रद्धालु आतें है।

  • शाहपुरा

    शाहपुरा

    भीलवाड़ा से 55 कि.मी. दूर शाहपुरा कस्बा है। यह चार दरवाजे वाली दीवार से घिरा, राम स्नेही संप्रदाय के अनुयायियों के लिए सन् 1804 में स्थापित तीर्थस्थान है। इस पंथ का एक पवित्र मंदिर है जिसे रामद्वारा कहा जाता है, इस रामद्वारा के मुख्य पुजारी ही इस पंथ-सम्प्रदाय के मुखिया है। पूरे वर्ष देशभर से तीर्थयात्री इस मंदिर की यात्रा करने आते हैं। यहाँ पांच दिन के लिए फूल डोल मेला के रूप में जाना जाने वाला वार्षिक मेला फाल्गुन शुक्ला (मार्च-अप्रैल) में आयोजित किया जाता है। शाहपुरा के उत्तरी भाग में एक विशाल महल परिसर है, जो छज्जों, मीनारों और छतरियों द्वारा सुशोभित है। इसके ऊपरी भाग से रमणीय झील और शहर के सुंदर दृश्य को देखा जा सकता है। प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी केसरी सिंह, जोरावर सिंह और प्रताप सिंह बारहठ शाहपुरा के थे। त्रिमूर्ति स्मारक, बारहठ जी की हवेली, जो अब राजकीय संग्रहालय में परिवर्तित कर दी गई है। और पिवनीया तालाब यहाँ के अन्य महत्वपूर्ण आकर्षण हैं। शाहपुरा पारंपरिक फड़ चित्रकला के लिए भी जाना जाता है।

  • जहाजपुर

    जहाजपुर

    भीलवाड़ा से 90 किमी दूर जहाज़पुर स्थित है। शहर के दक्षिण में एक पहाड़ी के ऊपर एक विशाल किला गहरी खाई के साथ खड़ी दो प्राचीरों और उस पर अनगिनत बुर्जों के साथ समूह रूप में दिखाई पड़ता है। ऐसा माना जाता है कि यह मेवाड़ की सीमाओं की रक्षा के लिए राणा कुंभा द्वारा बनाये गये किलों में से एक है। गांव में शिव को समर्पित मंदिरों का एक समूह है, जिसे बारह देवरा कहते हैं। किले में भी कुछ मंदिर हैं, जिसमें एक सर्वेष्वर नाथ जी को समर्पित प्राचीन मंदिर है। जहाजपुर मुनिष्वरनाथ को समर्पित एक महत्वपूर्ण जैन मंदिर के लिए विख्यात है। यहाँ गांव और किले के बीच स्थित एक मस्जिद भी है, जिसे ’गैबी पीर’ के नाम से जाना जाता है। जिसका नाम मुहम्मद संत गै़बी के नाम पर है, जो सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान यहां रहे थे।

  • आसींद

    आसींद

    अपने मंदिरों के लिए जाने वाला यह स्थान खारी नदी के बाएं किनारे पर स्थित है। यह बाघ राव के बड़े बेटे सवाई भोज द्वारा निर्मित है जो मेवाड़ राज्य के प्रथम श्रेणी के कुलीनों में से एक थे। जिन्होंने राव का पद धारण किया था और सिसोदिया राजपूत के चूंड़ावत संप्रदाय से थे। रियासत के शासन के दौरान शहर में यह एक बड़ी संपत्ति थी जिसमें (72) बहत्तर गांव शामिल थे।

  • मांडलगढ़

    मांडलगढ़

    भीलवाड़ा से 54 किमी दूर स्थित इस जगह का नाम ऐतिहासिक महत्व का है। क्योंकि यह मध्य काल के दौरान कई युद्धों का साक्षी रहा है। इतिहास प्रसिद्ध हल्दी घाटी युद्ध के दौरान मुगल सम्राट अकबर ने इस स्थान पर डेरा जमाया था। लगभग आधा मील लंबा किला पहाड़ी के शिखर पर प्राचीरों और खाई की सुरक्षा के साथ अडिग है। माना जाता है कि किला बालनोट राजपूतों के एक प्रमुख द्वारा निर्मित किया गया था। किले में दो मंदिर हैं, जिसमें एक भगवान शिव को समर्पित है जिसे जलेश्वर कहा जाता है और ’द्वारा’ जिसे बड़ा मंदिर कहते हैं भगवान कृष्ण को समर्पित है।

भीलवाड़ा के उत्सव और परम्पराओं के आंनद में सम्मिलित हों। राजस्थान में हर दिन एक उत्सव है।

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  • गणगौर

    गणगौर

    गणगौर महोत्सव हर साल अप्रैल के महीने में मनाया जाता है। गण, भगवान शिव को इंगित करते हैं और गौरी भगवान का दैवीय संबंध है - पार्वती। इसलिए गणगौर का त्यौहार देवी पार्वती के दिव्य आनंद को मनाता है। पूरे 18 दिनों के लिए मनाये जाने वाले गणगौर त्यौंहारों में भीलवाड़ा की महिलाएं एक विशेष भूमिका निभाती हैं। गणगौर त्यौहार एक लंबी, रंगीन शोभा यात्रा है। कन्याऐं सुबह जल्दी स्नान कर त्यौहार के वस्त्रों को धारण कर अपने हाथों को मेहंदी से सजाती है और त्यौहार की मिठास में शामिल होने के साथ ही नृत्य प्रदर्शन करती हैं।

भीलवाड़ा में गतिविधियाँ, पर्यटन और रोमांच आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। राजस्थान में करने के लिए सदैव कुछ निराला है।

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यहाँ कैसे पहुंचें

यहाँ कैसे पहुंचें

  • Flight Icon निकटतम हवाई अड्डा उदयपुर हवाई अड्डा है 147 किलोमीटर।
  • Car Icon राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 79 और राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 79 भीलवाड़ा से गुजरती है।
  • Train Icon भीलवाड़ा रेल मार्ग द्वारा अजमेर, जोधपुर, जयपुर, कोटा, इंदौर जंक्षन, उज्जैन और दिल्ली से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।

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भीलवाड़ा के समीप दर्षनीय स्थल

  • उदयपुर

    148 कि.मी.

  • चित्तौडगढ़

    62 कि.मी.

  • कोटा

    164 कि.मी.